50+ Best Mirza Ghalib Shayari in Hindi

Mirza Ghalib shayari in Hindi.He is the world’s famous author in urdu & Hindi shayaries.

हम ने मोहब्बत के नशे में
स कर उसे खुदा बना डाला;
होश तब आया जब उसने कहा के,
खुदा किसी एक का नहीं गोत !


चंद तस्वीर-ऐ-बुताँ , चंद हसीनों के खतूत बा द मरने के मेरे घर से यह सामान निकला


Dard ko dil me

दर्द हो दिल में तो दबा कीजिये
दिल ही जब दर्द हो तो क्या कीजिये


दुःख दे कर सवाल करते हो
तुम भी ग़ालिब कमल करते हो


देख कर पूछ लिया हाल मेरा
चलो कुछ तो ख्याल करते हो !


शहर-ऐ-दिल में उदासियाँ कैसी
यह भी मुझसे सवाल करते हो !


मारना चाहे तो मर नहीं सकते
तुम भी जिन मुहाल करते हो !


अब किस किस की मिसाल दू में तुम को
हर सितम बे-मिसाल करते हो !


हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मेरे अरमान , लेकिन फिर भी कम निकले


Wo aye ghar me

वो आये घर में हमारे , खुदा की कुदरत है
कभी हम उन्हें कभी अपने घर को देखते है!


पीने दे शराब मस्जिद में बैठ के , ग़ालिब
या वो जगह बता जहाँ खुदा नहीं है!


हाथों की लकीरो पे मत जा ग़ालिब
नसीब उनके भी होते है जिनके हाथ नहीं होते !!


कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नजर नहीं आती
मौत का एक दिन मु’अइयन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती
आगे आती थी हाल-ए-दिल प हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती!!


ग़ालिब! प्रमिका का दिल जो मेरा घर है, मैं उसमें रहता हूँ. मेरे उस घर में प्रेम के अंकुर हरीतिमा के रूप में परवान चढ़ रहे है. मेरा शरीर तो बियाबान (जंगल) में हैं!!


Kitni mere gharme

किन्तु मेरे घर, मेरी प्रेमिका के दिल में बसंत ऋतु का आगमन हो गया है. उसके दिल में मेरे मेरे प्रेम के फूल खिल रहें हैं.


तुम्हारा मुझे इस तरह बार-बार ‘तू क्या हैं, तू क्या है’ कहकर मेरा अपमान करने का कारण क्या हैं. तुम ही मुझे बताओं कि सुसंस्कृत और शिष्ट लोग क्या इस तरह वार्तालाप करते हैं.


Mirza Ghalib shayari

हुई ताख़ीर तो कुछ बाइस-ए-ताख़ीर भी था
आप आते थे मगर कोई अनागीर भी!!


रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है !!


फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूँ
मैं कहाँ और ये वबाल कहाँ !!


‘ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइ’ज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे !


Ek thir jisme

एक तीर जिस में दोनों छिदे पड़े हैं
वो दिन गए कि अपना दिल से जिगर जुदा थ!


बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे


उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़ वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है!


जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है!


उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़ वो समझते है की बीमार का हाल अच्छा है!


तुम न आए तो क्या सहर न हुई
हाँ मगर चैन से बसर न हुई
मेरा नाला सुना ज़माने ने मगर,
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई!


Dil e nadan

दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है!


रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख ही से न टपका तो लहू क्या है!


फिर उसी बेवफा पे मरते हैं
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है
बेखुदी बेसबब नहीं ‘ग़ालिब’
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है!!


रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है !


मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले!


थी खबर गर्म, के ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्ज़े,
देखने हम भी गए थे, पर तमाशा न हुआ.!


तेरी दुआओं में असर हो तो, मस्जिद को हिला के दिखा, नहीं तो दो घूँट पी और मस्जिद को हिलता देख.!


बाजीचा-ऐ-अतफाल है दुनिया मेरे आगे,
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे.!


Isharat e katharahai

इशरत-ए-क़तरा है,
दरिया में फना हो जाना
डार का है तो गुजारना है,
दाव हो जाना ..!


हम को मालूम है,
जन्नत की हकीकत,
दिल के पास रुख को,
ग़ालिब ये ख्याल अचला है।!


मैं नादान था जो वफ़ा को,
तलाश करता रहा ‘ग़ालिब’,
यह न सोचा के एक दिन,
अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी..!


रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है!


हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन, दिल के खुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है!!


रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं..


Fikr a duniya me

फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूँ मैं कहाँ और ये वबाल कहाँ !!


क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूँ, मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में !!

~Mirza ghalib shayari


भीगी हुई सी रात में जब याद जल उठी, बादल सा इक निचोड़ के सिरहाने रख लिया !!


तोड़ा कुछ इस अदा से ताल्लुक उसने ग़ालिब, कि हम सारी उम्र अपना क़ुसूर ढूँढ़ते रहे।


हमने माना कि तग़ाफुल न करोगे लेकिन,
खाक हो जायेंगे हम तुझको ख़बर होने तक।


इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे काम के।


आईना क्यों न दूँ कि तमाशा कहें जिसे।
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे।।


Mirza ghalib

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक, वो समझते हैं बीमार का हाल अच्छा है।


बेवजह नहीं रोता कोई इश्क़ में ग़ालिब
जिसे ख़ुद से बढकर चाहो वो रुलाता ज़रूर है।


ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता। अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।।


ग़ालिब शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर,
या वो जगह बता जहाँ पर ख़ुदा न हो।


इस सादगी पे कौन न मर जाये ऐ खुदा।
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं।।


आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक।
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।।


Ashiqa hun

आशिक़ हूँ पर माशूक़ फ़रेबी है मेरा काम,
मजनू को बुरा कहती है लैला मेरे आगे।


ग़ालिब बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे,
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे।


हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है!


इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के


इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ खुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं!!


मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले!


हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मीरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले!


उन के देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक, वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है!


रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं का िल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है !


इशरत-इ-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना !!


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